(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.260. अध्यायः 260
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति कामादिशक्तिप्रतिपादनपूर्वकतज्जयोपायप्रतिपादनपरव्यासवाक्यानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

व्यास उवाच। 12-260-0x(6269)(75749)
हृदि कामद्रुमश्चित्रो मोहसंचयसंभवः।
क्रोधमानमहास्कन्धो विवित्सापरिवेषणः॥ 12-260-1(75750)
तस्य चाज्ञानमाधारः प्रमादः परिषेचनम्।
सोऽभ्यसूयापलाशो हि पुरा दुष्कृतसारवान्॥ 12-260-2(75751)
संमोहचिन्ताविटपः शोकशाखो भयाङ्कुरः।
मोहनीभिः पिपासाभिर्लताभिरनुवेष्टितः॥ 12-260-3(75752)
उपासते महावृक्षं सुलुब्धास्तत्फलेप्सवः।
आयतैः संयुताः पाशैः फलदं परिवेष्ट्य तम्॥ 12-260-4(75753)
यस्तान्पाशान्वशे कृत्वा तं वृक्षमपकर्षति।
गतः स दुःखयोरन्तं जरामरणयोर्द्वयोः॥ 12-260-5(75754)
संरोहत्यकृतप्रज्ञः ससत्वो हन्ति पादपम्।
स तमेवाहतो हन्ति विषं ग्रस्तमिवातुरम्॥ 12-260-6(75755)
तस्यानुगतमूलस्य मूलमुद्भियते बलात्।
योगप्रसादात्कृतिना साम्येन परमासिना॥ 12-260-7(75756)
एवं यो वेद कामस्य केवलं परिसर्पणम्।
एतच्च कामशास्त्रस्य सुदुःखान्यतिवर्तते॥ 12-260-8(75757)
शरीरं पुरमित्याहुः स्वामिनी बुद्धिरिष्यते।
तत्र बुद्धेः शरीरस्थं मनो नामार्थचिन्तकम्॥ 12-260-9(75758)
इन्द्रियाणि जनाः पौरास्तदर्थं तु परा कृतिः।
तत्र द्वौ दारुणौ दोषौ तमो नाम रजस्तथा।
तदर्थमुपजीवन्ति पौराः सह पुरेश्वरैः॥ 12-260-10(75759)
अद्वारेण तमेवार्थं द्वौ दोषावुपजीवतः।
तत्र बुद्धिर्हि दुर्धर्षा मनः साधर्म्यमुच्यते॥ 12-260-11(75760)
पौराश्चापि मनस्तृप्तास्तेषामपि चला स्थितिः।
यदर्थं बुद्धिरध्यास्ते सोऽनर्थः परिषीदति॥ 12-260-12(75761)
`पौरमन्त्रवियुक्तायाः सोऽर्थः संसीदति क्रमात्'।
यदर्थं पृथगध्यास्ते मनस्तत्परिषीदति॥ 12-260-13(75762)
पृथग्भूतं मनो बुद्ध्या मनो भवति केवलम्।
तत्रैनं विकृतं शून्यं रजः पर्यवतिष्ठते॥ 12-260-14(75763)
तन्मनः कुरुते सख्यं रजसा सह संगतम्।
तं चादाय जनं पौरं रजसे संप्रयच्छति॥ ॥ 12-260-15(75764)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 260॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-260-1 विधित्सा परिषेचन इति झ. पाठः॥ 12-260-3 शोकशाखाभयंकर इति ड. थ. पाठः॥ 12-260-4 फलादायिभिरन्वित इति ध. पाठः। पाशैः फलानि परिभक्षयन्निति ड. थ. पाठः॥ 12-260-5 त्यागप्रमाद कृतिनेति ड. थ. पाठः॥


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